वैश्विक स्तर पर बदलते भाषायी परिवेश के साथ-साथ विद्यालयी शिक्षा में भी हिंदी-शिक्षण प्रक्रिया में व्यावहारिक परिवर्तन की दरकार होना स्वाभाविक है| आज हमारा विद्यार्थी कमोवेश किसी विषयवस्तु पर अधिकतर ‘हिंग्लिश’ में अभिव्यक्ति कर पाता है साथ ही लेखन में भी सुधार की बहुत गुंजाइश रहती है | ‘ठीकरा दूसरे के सिर पर फोड़ने’ की आदत भाषायी दक्षता के विकास के सभी द्वार बंद कर देती है| क्यों न एक शिक्षक जो कक्षा पहली या छठी में भाषा-शिक्षण करता है, वह उन्हीं बच्चों को पाँचवीं या दसवीं तक पढ़ाए?
अब प्रश्न उठता है कि ऐसे बच्चे जिन्हें ‘सही लिखना-पढ़ना नहीं आता’ चाहे किसी भी कक्षा के क्यों न हों; में अपेक्षित सुधार क्या और कैसे किए जाएँ ? इसके लिए कुछ सहज प्रयोग किए जा सकते हैं| वर्तनी संबंधी दोषों को दूर करने के लिए ‘बारहखड़ी’ अभ्यास में व्यंजनों के क्रमानुसार मात्राओं से शब्द-निर्माण की पुन: शुरुआत की जाए; जैसे ‘क्’ व्यंजन में स्वरों के जुड़ने से रूप-परिवर्तन : ‘कम-काम’, ‘कहा कि-कहाँ की’, ‘कुल-कूल’ ‘केक-एकैक’, ‘कोना-कौन’… इत्यादि | हर दिन कालांश के प्रारम्भ में दो-तीन मिनट एक शब्द-युग्म पर चर्चा होनी चाहिए | तत्पश्चात ‘ख्’ और अन्य व्यंजनों को लें| इसी क्रम में अभ्यास से बच्चों की मात्रा-संबंधी अशुद्धियाँ धीरे-धीरे दूर होने लगेंगी| यह कार्य एक-दो महीने का नहीं है,अपितु दीर्घगामी है।
दैनिक अख़बार पढ़ने और अपने आसपास क्या हो रहा है? कुछ जानने की प्रवृत्ति का विस्तार करने की दृष्टि से बच्चे दैनिक समाचार पत्रों से मनपसंद रंग-बिरंगे चित्रों के साथ संकलित समाचारों को सुंदर ढंग से अपनी पुस्तिका में चस्पाएँ और समाचारों से जो उन्होंने समझा, उसे सार के रूप में अपने शब्दों में लिखें| इस दौरान कुछ नए और कठिन शब्द भी मिलेंगे उनका संकलनकर शब्दकोश से ढूँढ़कर अर्थ लिखें| यह कार्य तिमाही या छमाही समयावधि में अपनी सुविधानुसार किया जा सकता है| दूसरे चरण में शब्दकोश-निर्माण और उसके प्रयोग से समसामयिक घटनाओं या बच्चों के दैनिक जीवन से जुड़ी विषयवस्तु पर आधारित अधूरी कहानी, अधूरे अनुच्छेद या कविता को पूरा करने संबंधी गतिविधियाँ संपन्न की जा सकती हैं।
इसी तरह पाठ्यपुस्तक में प्रयुक्त लोकोक्ति और मुहावरों के प्रयोग से कहानी कथन , संवाद, परिचर्चा (विषय रोज़मर्रा के अनुभव आधारित हों) का आयोजन और उसके पश्चात उसका लेखन करवाने से भी आशातीत लाभ होता है। इन कार्यों को ऑनलाइन प्रश्नोत्तरी का रूप देने में हमें बच्चों की सहायता करनी होगी | जब इन कार्यों की ऑनलाइन सराहना होगी तो उससे होने वाली प्रसन्नता को किसी प्राप्त पुरस्कार से कमतर नहीं आंका जा सकता।
लेखक-
लक्ष्मी प्रसाद चौधरी
स्नातकोत्तर शिक्षक, हिंदी
केंद्रीय विद्यालय क्रमांक 3 , भोपाल