आज़ादी के बाद हिंदी का विकास

भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी सहज रूप से विकसित हो रही है। विभिन्न भाषाओं के शब्दों को आत्मसात् कर और सशक्त हो रही है यानी हमारा  दिल तो हिंदुस्तानी है पर जूता जापानी, पतलून इंग्लिस्तानी और टोपी रूसी हो गई है। गोपाल सिंह नेपाली जी के शब्दों में – “हिंदी जन मन की गंगा है उसे अपने आप पनपने देना चाहिए।“  वे कहते हैं –

“दो वर्तमान का सत्य सरल, सुंदर भविष्य के सपने दो ।

हिंदी है भारत की बोली , तो अपने आप पनपने दो।

कोटि-कोटि कंठों की भाषा, जनमन की मुखरित अभिलाषा।

हिंदी है पहचान हमारी, हिंदी हम सब की परिभाषा।

किसी भी भाषा का विकास , जीवन और समृद्धिकाल  मूलतः दो कारकों पर निर्भर होता है- पहला भाषा का सृजनात्मक प्रयोग और दूसरा भाषा की प्रयोजनीयता।  इन दोनों दृष्टियों से हिंदी खूब विकस रही है किंतु अपने आपको शिष्ट समझने वाले भारतीय समाज का पश्चिमी साहित्य की ओर विशेष रूप से झुकाव कहीं न कहीं इसमें बाधक रहा है फिर भी विश्व पटल पर भारतीयों की पहुंच ने भारतीय भाषाओं में विशेषकर हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में प्रश्रय दिया है । इसमें हिंदी फ़िल्मों और हिंदी गीतों  का विशेष योगदान रहा है। हालांकि विश्व के विभिन्न देशों में भारतीयों के बढ़ रहे दबदबे से उन देशों की चिंताएँ उनकी करतूतें किसी से छिपी नहीं है।  गयाना में सन् 1953,  1957 और 1961 में संपन्न हुए तीनों चुनावों में बहुमत प्राप्त डॉ. छेदी जगन की सरकार को बार-बार अपदस्थ किए जाने के बाद सरकार ने भारतीयों की सांस्कृतिक अस्मिता को तोड़ने का प्रयास किया तो वहीं सन् 1982 में सुरीनाम में हुए सैनिक विद्रोह का मूल भारतीय लोगों के बढ़ते वर्चस्व को तोड़ना था । इसी प्रकार सन्1987 में फीजी की प्रजातांत्रिक प्रक्रिया से चुनी गई भारतवंशी बहुल सरकार को भी सैनिक विद्रोह के द्वारा अपदस्थ कर दिया गया और संवैधानिक व्यवस्था में ऐसा परिवर्तन किया गया कि अब सबसे दीन-हीन दशा में जीवन जीने के लिए भारतीय मजबूर हैं। मारीशस में फ्रांस, त्रिनिडाड में अमेरिकी सत्ता का प्रभाव रहा है । विश्व में हिंदी की विकास धारा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा जो एक निजी संस्थान है;के सहयोग से 10 से 14 जनवरी के बीच सन् 1975 में  पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में हुआ जिसमें ‘हिंदी वसुधा की भाषा के रूप में सुशोभित हो’- विचार को महत्व दिया गया । इसका केंद्रीय विषय ‘वसुधैव कुटुंबकम’ रखा गया था । उसके बाद निरंतर विश्व हिंदी सम्मेलनों की शृंखला चलती रही हैं और विश्वभर के  प्रवासी तथा अप्रवासी भारतीय इनके माद्यम से आपस में मिलकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। आज लगभग 180 देशों में हिंदी प्रचलित है और 175 से अधिक देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा के अध्ययन- अध्यापन की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। हिंदी शिक्षक के रूप में डॉ. पीटर फेड्लर  का कैनबरा की ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।इटेलियन मार्को जोली हिंदी शिक्षक ने इटली में व्यापार केंद्र की स्थापना की है ।  जापान में दाईतो बुंका विश्वविद्यालय में प्रो. हिदेआकि इशिदा  हिंदी की सेवा कर रहे हैं। वे कहते हैं –“उन्हें जिंदगी में हिंदी साहित्य और हिंदी भाषा से जो भी मिला है; उसका लाखवाँ हिस्सा भी अपने कार्य के माध्यम से जापानियों तक पहुंचा सकूं तो अपने को सौभाग्यशाली समझूंगा।“ वहां से उनके द्वारा हिंदी साहित्य की पत्रिका का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण कदम है।  इसी प्रकार विश्व में अनेक पत्रिकाएं; जैसे- फिजी में फिजीबात, सुरीनाम में सूरीनामी हिंदी, दक्षिण अफ्रीका में नैताली, नेपाल में साहित्यलोक, उज्बेकिस्तान और तजाकिस्तान में ‘पारया’ आदि हिंदी पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं।

भाषा हमारी सांस्कृतिक पहचान होती है । इसमें स्वैच्छिक प्रतीकों की ऐसी व्यवस्था होती है जिसका संबंध हमारे मन मस्तिष्क से होता है। हमारा मस्तिष्क उसमें जितना अधिक सहभागी होगा उतना ही विकसित होगा। अपनी भाषा में सोचना और उस सोच को कार्यरूप देना बहुत ही सहज होता है । आज नई-नई  भाषिक शैलियों का जन्म हो रहा है।  इस दृष्टि से हिंदी भाषा के स्वरूप में भी निरंतर परिवर्तन हो रहा है । विश्व के परिपेक्ष में देखा जाए तो  सहजता, वैज्ञानिक संप्रेषणशीलता और चेतना की दृष्टि से हिंदी विश्व मानवता का ज्योतिपुंज है। इसके विकास की धारा निरंतर गतिमान है।

भारत में हिंदी को संवैधानिक मर्यादाओं में बाँधने का प्रयास किया गया जिससे उसको क्षति हुई।  भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित कर दिया गया था किंतु अनुच्छेद 345 के अनुसार राज्यों को हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषा को  राज्य की राजभाषा के रूप में स्वीकार करने का अधिकार दे देना तथा तत्कालीन भाषायी समस्या से निज़ात पाने और उक्त  दोनों संदर्भों में आगामी 15 वर्षों के लिए अंग्रेजी में कामकाज की छूट  देना; इसके गले की हड्डी बन गई।  यहां मैं राष्ट्रभाषा और राजभाषा की अवधारणा को स्पष्ट कर देना चाहता हूं । राष्ट्रभाषा का शब्द-भंडार विविध बोलियों, उपभाषाओं और लोक प्रयोजन के अनुसार समृद्धि पाते रहता है जबकि राजभाषा राजकीय कामकाज की भाषा होती है जो सुनिश्चित मानक और प्रयोजनमूलक शब्दावली का अनुसरण करती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय भाषाओं को महत्व देना एक अच्छा संकेत है। नई शिक्षा नीति के 22.5 अनुच्छेद में यूनेस्को द्वारा विगत 50 वर्षों में 197 भारतीय भाषाओं के लुप्त होने की रिपोर्ट पर चिंता व्यक्त की गई है तो वहीं 22.6 अनुच्छेद में संविधान की आठवीं अनुसूची की कई भाषाओं के अस्तित्व पर संकट गहराने की समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है इसीलिए नई शिक्षानीति में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में, आगे की शिक्षा क्षेत्रीय भाषा में हो और त्रिभाषा सूत्र अपनाने की बात कही गई है । भारत की शास्त्रीय भाषाओं – संस्कृत, पालि, प्राकृत, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, उड़िया और फारसी को महत्व देने; मातृभाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा प्रदान करने के विकल्प से निश्चित ही पश्चिमी सोच पर कुठाराघात होगा। नीति निर्धारक  यह बहुत देर से जान पाए हैं । गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था –“भारतीय भाषाएँ  नदियां हैं और हिंदी महानदी।“  इसी प्रकार महात्मा गांधी जी का यह विचार भी भाषाई समन्वय और भारतीय भाषाओं को महत्व देता है; उन्होंने कहा था-“ भारत में प्रांतीय भाषाओं की  नींव पर राष्ट्रीय भाषा की इमारत खड़ी होगी।“  खैर , अपनी शक्ति और क्षमता को पहचानने का हमें अब होश आया है। हमारे साथ सन् 1947 में आजाद हुआ छोटा-सा देश दक्षिण कोरिया भारत से कैसे आगे निकल गया? अपनी भाषा को महत्व न देने के दुष्परिणाम कितने घातक हो सकते हैं?  इससे समझा जा सकता है।  भारत में 90 करोड़ हिंदी, 9 करोड़ से अधिक आबादी तमिल, 10 करोड़ से अधिक बांग्लाभाषी रहते हैं ।  हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व देने से एक ओर  प्रतिभाओं में आत्मगौरव का भाव उत्पन्न होगा, मौलिक सोच को बढ़ावा मिलेगा तो वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी के बीच संघर्ष और गतिरोध में कुछ हद तक विराम लगेगा । यह एक अच्छा संकेत है कि शैक्षणिक सत्र 2021-22 से ही देश के 8 राज्यों के 14 इंजीनियरिंग कॉलेज पांच भारतीय भाषाओं हिंदी, तमिल, तेलुगू, मराठी और बांग्ला में इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम का अध्ययन आरंभ करने जा रहे हैं।   हिंदी को लेकर बहुत  संभावनाएं हैं। शब्द-निर्माण, अनुसरण, अनुवाद पर बहुत कार्य हो रहा है। कंप्यूटर के अनुप्रयोग से हिंदी को लेकर यह धारणा कि हिंदी कंप्यूटर के अनुकूल नहीं है या कंप्यूटर में हिंदी का काम बहुत कठिन है पर विराम लग गया है । कम्प्यूटर में हिंदी भाषा के ऐतिहासिक विकास पर चर्चा करना विषयांतर न होगा । लगभग सन् 1965 में हिंदी में कंप्यूटर के अनुप्रयोग का कार्य शुरू हो गया था ।सन् 1971-72 में आईआईटी कानपुर ने एक बहुत ही सरल कीबोर्ड और प्रणाली विकसित की जिसे सभी भारतीय भाषाओं के लिए उपयोग किया जा सकता था ।सन् 1978 में देवनागरी के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं में कार्य करने योग्य पहले ‘प्रोटोटाइप कंप्यूटर’ का नमूना हैदराबाद के इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में प्रस्तुत किया। इसी क्रम में सन् 1983 में बिरला प्रौद्योगिकी और विज्ञान संस्थान पिलानी और डीसीएम ने मिलकर पहला द्विभाषी कंप्यूटर ‘सिद्धार्थ’ का निर्माण किया। सन् 1985 में भारत सरकार के उपक्रम सीएमसी द्वारा ‘लिपि’ सॉफ्टवेयर से अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं में परस्पर लिप्यंतरण को गति मिली । आज डॉस, विंडोज, यूनिक्स, लीनिक्स आदि में हिंदी में सुगमता से कार्य हो रहा है। इस दृष्टि से आईबीएम, माइक्रोसॉफ्ट कार्पोरेशन और सरकारी संस्थानों में सीडेक पुणे का योगदान सराहनीय है।सन् 1987-88 में  इंटरनेट के आगमन से भारत में आर्थिक, शैक्षणिक और भाषाई दृष्टि से में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। यूनिकोड, ‘फॉन्ट परिवर्तक जो प्रिया इनफॉर्मेटिक्स प्राइवेट लिमिटेड पुणे के सहयोग से आईआईडीसी डॉट जीओवी डॉट इन द्वारा लिप्यंतरण हेतु सॉफ्टवेयर विकसित किया गया है। अनुवाद के लिए ‘मंत्रा’ और ‘शक्ति’ मशीनी अनुवाद प्रणाली विकसित हुई। गूगल का लैंग्वेज टूल, स्पीच टेक्स्ट और text-to-speech प्रणाली से श्रुतलेखन सॉफ्टवेयर विकसित हुआ किंतु इसमें मानक उच्चारण की कुछ समस्या आ रही है । संभावना है कि यह समस्या भी जल्दी ही दूर हो जाएगी। ओसीआर ऑप्टिकल कैरक्टर रिकॉग्निशन का विकास इमेजेस सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड हैदराबाद ने किया और उसके बाद यूनिकोड आधारित चित्रांकन सॉफ्टवेयर से चित्रों को डिजिटल टेक्स्ट में  बदला जाने लगा । राजभाषा विभाग द्वारा ‘लीला’( लर्न हिंदी लैंग्वेज थ्रू आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) द्वारा हिंदी माध्यम से प्रशिक्षण की व्यवस्था का होना एक अच्छा कदम है । नागरी प्रचारिणी सभा आगरा द्वारा हिंदी विश्वकोश का ई संस्करण हिंदी भाषा के विकास में और गति देगा । आज अभिव्यक्ति, अनुभूति, कलायन. भारत दर्शन. सृजनगाथा. शैक्षिक मंथन. अहा जिंदगी जैसी अधिकांश पत्रिकाओं के ई-संस्करण निकल रहे हैं।  हिंदी ब्लॉग, पॉडकास्टिंग, माइक्रो ब्लॉगिंग, ई-बुक्स जैसे कई माध्यम हैं जिसमें हिंदी फल-फूल रही है।

                                                                              -लक्ष्मी प्रसाद चौधरी

स्नातकोत्तर अध्यापक हिंदी

केंद्रीय विद्यालय भारतीय राजदूतावास काठमांडू नेपाल

Published by LP CHAUDHARI

• व्यवसाय- जवाहर नवोदय विद्यालय पदमी (मंडला) में प्रशिक्षित स्नातक हिंदी अध्यापक(1997-2000) तथा वर्तमान में केंद्रीय विद्यालय संगठन में स्नातकोत्तर हिंदी अध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य। * शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार से संबंधित संभाग स्तरीय कई कार्यशालाओं और बारह से अधिक राष्ट्र स्तरीय विभिन्न शिक्षक - प्रशिक्षण पाठ्यचर्याओं में संसाधक (स्रोत- व्यक्ति) के रूप कार्य। * राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु आयोजित गोष्ठियों और कार्यशालाओं में व्याख्यान । • साक्षरता और जन-जागृति अभियान- ‘अक्षर सैनिक’ के रूप में प्रौढों को साक्षर करने संबंधी कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता । नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्त रखने हेतु 'राष्ट्रीय नदी संरक्षण - जन-जागृति कार्यक्रम' में संयोजक के रूप रचनात्मक भागीदारी हेतु नगरपालिका परिषद होशंगाबाद द्वारा प्रशस्ति-पत्र। • साहित्य-सर्जना – विभिन्न पत्रिकाओं जैसे- ‘प्रबोधिनी’, ‘प्रतिका’ आदि में रचनाओं का प्रकाशन । • सम्पादन – ‘प्रतिबिम्ब’, ‘प्रत्यूषा’ का सम्पादन । • सम्मान – * केंद्रीय विद्यालय संगठन –‘राष्ट्रीय प्रोत्साहन पुरस्कार’ -2015 * केंद्रीय विद्यालय संगठन –‘संभागीय प्रोत्साहन पुरस्कार’ -2014 * राष्ट्रीय स्तर पर – ‘चाणक्य सम्मान’ - 2014 (विपिन जोशी स्मारक समिति, इटारसी द्वारा) * वर्ष 2012 और 2013 में लगातार दो बार प्रतिभूति कागज कारखाना होशंगाबाद द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में ‘आदर्श कर्मचारी’ का सम्मान। * नर्मदापुर युवा मंडल द्वारा ‘प्रेरक सम्मान’ ।

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