हिंदी व्याकरण : पद -परिचय

पद-परिचय
सबसे पहले ‘शब्द’ और ‘पद’ में अन्तर की लेना आवश्य है-

‘शब्द’ स्वतंत्र इकाई है। जब कोई शब्द ही वाक्य में प्रयुक्त होता है, तो पद कहलाता है।
जैसे:- ‘लड़का’। यहाँ ‘लड़का’ एक स्वतंत्र शब्द है।
लड़का घर जाता है। यहाँ ‘लड़का’ शब्द पद है।

पद-परिचय:- वाक्य में प्रयुक्त पदों का विस्तृत व्याकरणिक परिचय देना ‘पद परिचय’ कहलाता है। जैसे – लड़का घर जाता है।
लड़का – जाति वाचक, संज्ञा, पुल्लिंग, एकवचन, कर्ताकारक ‘जाता है’ क्रिया का कर्ता।
1. संज्ञा का पद परिचय
संज्ञा के पद-परिचय के लिए संज्ञा शब्दों के भेद, उपभेद, लिंग, वचन, कारक आदि की जानकारी होनी आवश्यक है। इसलिए संज्ञा के पद-परिचय देते समय जिन बातों की जानकारी होनी आवश्यक है, वे हैं-
i. संज्ञा – संज्ञा के तीन भेद हैं – 1. व्यक्तिवाचक संज्ञा, जातिवाचक संज्ञा व भाववाचक संज्ञा।
ii. लिंग – पुल्लिंग, स्त्रीलिंग।
iii. वचन – एकवचन या बहुवचन।
iv. कारक – कर्ता कारक, कर्म कारक, करण कारक, संप्रदान कारक, अपादान कारक, संबंध कारक, अधिकरण कारक तथा संबोधन कारक।
v. यदि संज्ञा का क्रिया के संबंध हो, तो उसे बताना।
2.सर्वनाम का पद परिचय-
सर्वनाम के 6 भेद होते हैं। पुरूष वाचक सर्वनाम, निश्चय वाचक सर्वनाम, अनिश्चय वाचक सर्वनाम, संबंध वाचक सर्वनाम, प्रश्न वाचक सर्वनाम तथा निज वाचक सर्वनाम। इनका लिंग, वचन, पुरुष, कारक, क्रिया के साथ संबंध बताना।
1. पुरुषवाचक सर्वनाम-
जिस सर्वनाम का प्रयोग वक्ता या लेखक स्वयं अपने लिए अथवा श्रोता या पाठक के लिए अथवा किसी अन्य के लिए करता है वह पुरुषवाचक सर्वनाम कहलाता है। पुरुषवाचक सर्वनाम तीन प्रकार के होते हैं-
(1) उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम- जिस सर्वनाम का प्रयोग बोलने वाला अपने लिए करे, उसे उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-मैं, हम, मुझे, हमारा आदि।
(2) मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम- जिस सर्वनाम का प्रयोग बोलने वाला सुनने वाले के लिए करे, उसे मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-तू, तुम,तुझे, तुम्हारा आदि।
(3) अन्य पुरुषवाचक सर्वनाम- जिस सर्वनाम का प्रयोग बोलने वाला सुनने वाले के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष के लिए करे उसे अन्य पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-वह, वे, उसने, यह, ये, इसने, आदि।
2. निश्चयवाचक सर्वनाम
जो सर्वनाम किसी व्यक्ति वस्तु आदि की ओर निश्चयपूर्वक संकेत करें वे निश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। इनमें ‘यह’, ‘वह’, ‘वे’ सर्वनाम शब्द किसी विशेष व्यक्ति आदि का निश्चयपूर्वक बोध करा रहे हैं, अतः ये निश्चयवाचक सर्वनाम है।
3. अनिश्चयवाचक सर्वनाम
जिस सर्वनाम शब्द के द्वारा किसी निश्चित व्यक्ति अथवा वस्तु का बोध न हो वे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। इनमें ‘कोई’ और ‘कुछ’ सर्वनाम शब्दों से किसी विशेष व्यक्ति अथवा वस्तु का निश्चय नहीं हो रहा है। अतः ऐसे शब्द अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
4. संबंधवाचक सर्वनाम
परस्पर एक-दूसरी बात का संबंध बतलाने के लिए जिन सर्वनामों का प्रयोग होता है उन्हें संबंधवाचक सर्वनाम कहते हैं। इनमें ‘जो’, ‘वह’, ‘जिसकी’, ‘उसकी’, ‘जैसा’, ‘वैसा’-ये दो-दो शब्द परस्पर संबंध का बोध करा रहे हैं। ऐसे शब्द संबंधवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
5. प्रश्नवाचक सर्वनाम
जो सर्वनाम संज्ञा शब्दों के स्थान पर तो आते ही है, किन्तु वाक्य को प्रश्नवाचक भी बनाते हैं वे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। जैसे-क्या, कौन आदि। इनमें ‘क्या’ और ‘कौन’ शब्द प्रश्नवाचक सर्वनाम हैं, क्योंकि इन सर्वनामों के द्वारा वाक्य प्रश्नवाचक बन जाते हैं।
6. निजवाचक सर्वनाम
जहाँ अपने लिए ‘आप’ शब्द ‘अपना’ शब्द अथवा ‘अपने’ ‘आप’ शब्द का प्रयोग हो वहाँ निजवाचक सर्वनाम होता है। इनमें ‘अपना’ और ‘आप’ शब्द उत्तम, पुरुष मध्यम पुरुष और अन्य पुरुष के (स्वयं का) अपने आप का बोध करा रहे हैं। ऐसे शब्द निजवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
विशेष-जहाँ केवल ‘आप’ शब्द का प्रयोग श्रोता के लिए हो वहाँ यह आदर-सूचक मध्यम पुरुष होता है और जहाँ ‘आप’ शब्द का प्रयोग अपने लिए हो वहाँ निजवाचक होता है।
सर्वनाम शब्दों के विशेष प्रयोग
(1) आप, वे, ये, हम, तुम शब्द बहुवचन के रूप में हैं, किन्तु आदर प्रकट करने के लिए इनका प्रयोग एक व्यक्ति के लिए भी होता है।
(2) ‘आप’ शब्द स्वयं के अर्थ में भी प्रयुक्त हो जाता है। जैसे-मैं यह कार्य आप ही कर लूँगा। परस्पर एक-दूसरी बात का संबंध बतलाने के लिए जिन सर्वनामों का प्रयोग होता है उन्हें संबंधवाचक सर्वनाम कहते हैं। इनमें ‘जो’, ‘वह’, ‘जिसकी’, ‘उसकी’, ‘जैसा’, ‘वैसा’-ये दो-दो शब्द परस्पर संबंध का बोध करा रहे हैं। ऐसे शब्द संबंधवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
5. प्रश्नवाचक सर्वनाम
जो सर्वनाम संज्ञा शब्दों के स्थान पर तो आते ही है, किन्तु वाक्य को प्रश्नवाचक भी बनाते हैं वे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। जैसे-क्या, कौन आदि। इनमें ‘क्या’ और ‘कौन’ शब्द प्रश्नवाचक सर्वनाम हैं, क्योंकि इन सर्वनामों के द्वारा वाक्य प्रश्नवाचक बन जाते हैं।
6. निजवाचक सर्वनाम-
जहाँ अपने लिए ‘आप’ शब्द ‘अपना’ शब्द अथवा ‘अपने’ ‘आप’ शब्द का प्रयोग हो वहाँ निजवाचक सर्वनाम होता है। इनमें ‘अपना’ और ‘आप’ शब्द उत्तम, पुरुष मध्यम पुरुष और अन्य पुरुष के (स्वयं का) अपने आप का बोध करा रहे हैं। ऐसे शब्द निजवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।
विशेष-जहाँ केवल ‘आप’ शब्द का प्रयोग श्रोता के लिए हो वहाँ यह आदर-सूचक मध्यम पुरुष होता है और जहाँ ‘आप’ शब्द का प्रयोग अपने लिए हो वहाँ निजवाचक होता है।
सर्वनाम शब्दों के विशेष प्रयोग
(1) आप, वे, ये, हम, तुम शब्द बहुवचन के रूप में हैं, किन्तु आदर प्रकट करने के लिए इनका प्रयोग एक व्यक्ति के लिए भी होता है।
(2) ‘आप’ शब्द स्वयं के अर्थ में भी प्रयुक्त हो जाता है। जैसे-मैं यह कार्य आप ही कर लूँगा।

3. विशेषण का पद परिचय

विशेषण का पद परिचय देते समय निम्नलिखित बातों का उल्लेख करना होता है-
1. विशेषण का प्रकार- विशेषण के चार भेद होते हैं – गुणवाचक विशेषण, परिमाण वाचक विशेषण, संख्या वाचक विशेषण तथा सार्वनामिक विशेषण।
2. लिंग,
3. वचन,
4. ‘विशेष्य’ ।
पद परिचय के लिए विशेषण के बारे में निम्नलिखित जानकारी आवश्यक है-
निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित अंशों पर ध्यान दीजिए –
1. मुझे चार अनार दीजिए।
2. मेरा छोटा भाई बहुत अच्छा है।
3. राकेश मीठे आम लेने गया है।
उपर्युक्त वाक्यों में चार छोटा, अच्छा, मीठे शब्द अपनी-अपनी (अनार, भाई, आम) की विशेषता बता रहे हैं। ये शब्द ‘विशेषण’ कहलाते हैं और जिस संज्ञा/सर्वनाम की विशेषता बताई जाए, वह विशेष्य कहलाता है। यहाँ विशेष्य हैं- अनार, भाई, आम।
परिभाषा – जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताते हैं, उन्हें विशेषण कहते हैं।
विशेषण के भेद –
1. गुणवाचक विशेषण – जिस शब्द से संज्ञा/सर्वनाम के गुण, रूप-रंग, आकार, काल, दशा, स्वाद आदि का बोध हो। जैसे – गुण – भला, बुरा, उचित, अनुचित, सच्चा, झूठा, पापी, दानी, दुष्ट, सीधा, शांत, झूठा, ईमानदार आदि।
रूप रंग – उजला, मैला, लाल, पीला, सुनहरा, चमकीला, धुँधला आदि।
आकार – गाल, चौकोर, लंबा, चौड़ा, सुडौल, समान, सपाट, नुकीला आदि।
काल – नया, पुराना ताजा, प्राचीन, अगला, मौसमी, आगामी, पिछला आदि।
दशा – दुबला, पतला, मोटा, भारी, पिघला, गाढ़ा, गीला, सूखा, घना, रोगी आदि।
स्वाद / गंध – मीठा, फीका, खट्टा, सुगंधित, बदबूदार, तीखा आदि।
2. परिमाणवाची विशेषण – ‘परिमाण’ का अर्थ है – ‘मात्रा’। अर्थात् जो विशेषण अपने विशेष्य की माप- तौल (परिमाण) बोध कराए, उसे परिमाणवाचक/परिमाणबोधक विशेषण कहते हैं। इसके दो भेद हैं –
(क)निश्चित परिमाणवाचक – दो सेर घी, दस हाथ जगह, एक मीटर कपड़ा। यहाँ रेखांकित विशेषण विशेष्य की निश्चित मात्रा का बोध कराते हैं।
(ख)अनिश्चित परिमाणवाचक – बहुत दूध, सब धन, पूरी जमीन। यहाँ रेखांकित विशेषण की अनिश्चित मात्रा का बोध कराते हैं। अनिश्चित परिमाण (मात्रा) का बोध कराने वाले शब्द हैं – बहुत, ज़रा, अधिक, तनिक, इतना, जितना, कुछ, थोड़ा, आदि।
3. संख्यावाचक विशेषण – विशेष्य की संख्या का बोध कराता है। इसके दो भेद हैं –
(क) निश्चित संख्यावाचक विशेषण – विशेष्य की निश्चित संख्या का बोध होता हे।
जैसे – पूर्ण संख्या बोधक – तीस बच्चे, चार केले आदि।
अपूर्ण संख्याबोधक – सवा, डेढ़, साढ़े तीन आदि।
क्रमबोधक – पहला, दूसरा, तीसरा आदि।
आवृत्तिबोधक – दूना, तिगुना, चौगुना आदि।
समुदायवाचक – दोनों, तीनों, चारों आदि।
प्रत्येक बोधक – प्रत्येक, हर-एक, दो-दो, सवा-सवा आदि।
(ख) अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण – विशेष्यी निश्चत संख्या का बोध नहीं होता।
जैसे – कुछ, कई, काफी आदि।
उदाहरणार्थ – 1. कुछ बच्चे बाहर चले गए हैं।
2. किताब लगभग पूरी पढ़ ली है, बस थोड़े पन्ने बाकी हैं।
अन्य रीतियाँ है – लगभग बीस, कोई चार सौ, सैकड़ों, दस-बीस, पचास एक आदि।
4. सार्वनामिक विशेषण – जो सर्वनाम संज्ञा की विशेषता बताने के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। सार्वनामिक विशेषण को संकेतवाचक विशेषण भी कहते हैं।
जैसे – 1. मेरी पुस्तक मुझे दीजिए।
2. कोई लड़का इधर आ रहा है।
3. कौन आदमी आया है?
4. जिस व्यक्ति का सामान हो, ले जाए।
यहाँ रेखांकित पद सार्वनामिक विशेषण हैं।
परिमाणवाचक विशेषण और संख्यावाचक विशेषण में अंतर –
शब्द परिमाणवाचक विशेषण संख्यावाचक विशेषण

कुछ गिलास में कुछ दूध है। मैदान में कुछ बच्चे खेल रहे हैं।
बहुत रास्ते में बहुत कीचड़ है। शादी में बहुत लोग नहीं आ पाए।
तीन तीन दर्जन केले सड़ गए हैं। तीन केले सड़ गए हैं।
सार्वनामिक विशेषण और सर्वनाम में अंतर –
शब्द सार्वनामिक विशेषण सर्वनाम
कुछ वहाँ कुछ लोग हैं। वहाँ कुछ है।
कोई बाहर कोई बालक रो रहा है। बाहर कोई रो रहा है।
कौन सामान कौन-सा आदमी ले गया? सामान कौन ले गया?
यह यह पुस्तक अच्छी है। तुम्हारी पुस्तक वह है और मेरी पुस्तक यह।

प्रविशेषण – जो शब्द विशेषण की विशेषता बताते हैं, प्रविशेषण कहलाते हैं।
जैसे – 1. संतोष बहुत चतुर लड़का है। (बहुत – प्रविशेषण, चतुर – विशेषण)
2. हल्का पीला फूल देखो। (हल्का – प्रविशेषण, पीला – विशेषण)
सामान्यत: प्रचलित प्रविशेषण हैं – बहुत, बहुत अधिक, अत्यधिक, अत्यंत, बड़ा, बिल्कुल, थोड़ा, कम, लगभग आदि।
विशेषणों की अवस्था-
मूलावस्था (तुलना नहीं) उत्तरावस्था ‘तर’ वाला रूप (दो में तुलना) उत्तमावस्था ‘तम’ वाला रूप (सर्वोत्तम)
महान महत्तर महत्तम
गुरू गुरूतर गुरूतम
उच्च उच्चतर उच्चतम
अधिक अधिकतर अधिकतम

4.क्रिया का पद परिचय
क्रिया का पद परिचय देते समय निम्नलिखित बातों का उल्लेख करना होता है-
1. क्रिया के भेद-अकर्मक, सकर्मक, मुख्य क्रिया,सहायक क्रिया, संयुक्त क्रिया आदि।
2. लिंग,
3. वचन,
4. धातु
5. काल,
6. वाच्य
7. प्रयोग।
पद परिचय के लिए क्रिया के बारे में निम्नलिखित जानकारी आवश्यक है-
क्रिया – किसी कार्य के करने, होने या स्थिति का बोध कराने वाले शब्द/पद क्रिया कहलाते हैं। जैसे – किया शब्द – चलना, खाना, पीना आदि।
क्रिया पद – 1. किसान हल चला रहा था। (क्रिया का करना)
2. हवा चलती है। (क्रिया का होना)
3. वह ड्राइवर है। (स्थिति का बोध)
यहाँ रेखांकित पद क्रियाएँ हैं। किसी भी वाक्य में क्रिया पद अवश्य होता है। यह प्राय: अंत में होता है।
धातु – क्रिया का मूल रूप ‘धातु’ कहलाता है। इसे क्रियामूल भी कहते हैं। यह प्राय: सभी क्रियारूपों में पाया जाता है। जैसे –
‘आ’ – आता, आएगा, आइए, आना।
‘चल’ – चलता, चला, चलेगा, चलूँगा, चलना।
हिंदी में क्रिया का सामान्य रूप मूलधातु में ‘ना’ जोड़कर बनाया जाता है। जैसे – चल+ना = चलना, देख+ना = देखना।
क्रिया के प्रकार-कर्म/रचना की दृष्टि से क्रिया के मुंख्यत: दो भेद हैं –
1. सकर्मक क्रिया – इसके प्रयोग में कर्म की आवश्यकता होती है। यह कर्म के बिना अपना भाव पूरी तरह प्रकट नहीं कर पाती। जैसे – पढऩा लिखना, देखना, खाना, पीना, गाना, मारना, खरीदना, धोना, देना आदि।
जैसे – (क) सोहन पुस्तक पढ़ता है। (पुस्तक – कर्म है)
(ख) वह खाना खा रहा है। (खाना – कर्म है)
सकर्मक क्रिया के भेद – इसके तीन भेद हैं –
(1) पूर्ण एककर्मक क्रिया – ये एक कर्म के साथ जुड़कर पूरा अर्थ देती हैं।
जैसे – (क) बढ़ई लकड़ी काट राह है।
(ख) मिस्त्री दीवार बनाता है।
(ग) सोहन ने फल खरीदा।
यहाँ प्रत्येक वाक्य में एक-एक कर्म (तिरछे छपे पद ) है, जिससे क्रिया पूरा अर्थ प्रकट करती है।
2. पूर्ण द्विकर्मक क्रिया – इसके दो कर्म की आवश्यकता होती है। लेना, देना, बताना और सभी प्रेरणार्थक क्रियाएँ इसी के अंतर्गत आती हैं। जैसे –
(क) सीमा ने महेश को पुस्तक दी।
(ख) अध्यापिका ने विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ाई।
(ग) विनोद ने आशा को अपनी कार बेच दी।
उपर्युक्त वाक्यों में (तिरछे छपे )पद दो-दो कर्म हैं।
ध्यान रखें – ‘देना’ क्रिया में वस्तुत: दो कर्म नहीं होते, एक संप्रदान होता है (जिसे दिया जाता है) और एक कर्म होता है (वह वस्तु आदि, जो दी जाती है), किंतु मोटे तौर पर दोनों को कर्म मान लिया जाता है। जब किसी वाक्य में दो कर्म होते हैं तो उनमें जो प्राणिवाचक कर्म होता है, वह गौण होता है, जिसके साथ ‘को’ परसर्ग लगा होता है तथा अप्राणिवाचक प्रधान कर्म; जिसके साथ ‘को’ परसर्ग नहीं लगाया जाता। प्रधान या मुख्य कर्म क्रिया पद के निकट होता है।
3. अपूर्ण सकर्मक क्रिया – जिनमें कर्म रहते हुए भी अर्थ का पूरा बोध नहीं होता और उसे पूरा करने के लिए कर्म से संबंध रखने वाले एक अन्य शब्द की आवश्यकता होती है। चुनना, मानना, समझना, बनाना आदि इसी प्रकार की क्रियाएँ हैं।
जैसे – (क) रेखा श्याम को बुद्धिमान समझती है।
(ख) मैं आपको अपना बड़ा भाई मानता हूँ।
अकर्मक क्रिया
अकर्मक क्रिया के भेद – इसके भी तीन भेद हैं –
(क) स्थित्यर्थक/अवस्थाबोधक पूर्ण अकर्मक क्रिया – ये कियाएँ स्थिर अवस्था में होती हैं तथा बिना कर्म या पूरक के भी पूरा अर्थ देती हैं। जैसे – सोना, हँसना, रोना, खिलना आदि।
(1) सोहन इस समय सो रहा है। (सोने की अवस्था)
(2) शशांक रो रहा था। (रोने की अवस्था)
अस्तित्ववादी क्रिया ‘होना’ भी इसी का उपभेद है। जैसे – ईश्वर है।
(ख) गत्यर्थक पूर्ण अकर्मक क्रिया – ये क्रियाएँ भी बिना कर्म या पूरक के पूरा अर्थ देती हैं किंतु क्रिया करने वाला कर्ता गतिमान रहना है। जैसे – जाना, आना, दौड़ना, भागना आदि।
(1) नूतन भोपाल जा रही है।
(2) पक्षी आकाश में उड़ रहे हैं।
(ग) अपूर्ण अकर्मक क्रिया – इन क्रियाओं में किसी कर्म की आवश्यकता नहीं होती, परंतु किसी अन्य पूरक की अवश्य आवश्यकता होती है। जैसे – ‘होना’, ‘बनाना’, निकलना आदि।
(1) मैं बीमार हूँ इसलिए आ न सकूँगा।
(2) मानसी बहुत होशियार है
उपर्युक्त वाक्यों में ‘बीमार’ और ‘होशियार’ पूरक हैं। इनका लोप करने पर वाक्य अधूरा लगता है। यहाँ (तिरछे छपे पद )क्रियाएँ अपूर्ण अकर्मक हैं।
अकर्मक का सकर्मक क्रिया में परिवर्तन – क्रियाओं का अकर्मक या सकर्मक होना, धातु के अर्थ से सीधे संबंधित न होकर, प्रयोग पर निर्भर करता है। इस कारण कभी-कभी अकर्मक क्रियाएँ सकर्मक प्रयोग में तथा सकर्मक क्रियाएँ अकर्मक प्रयोग में मिलती हैं। जैसे –
पढऩा (सकर्मक) – अर्चना पुस्तक पढ़ रही है।
पढऩा (अकर्मक) – अर्चना! तुम्हें रोज़ पढ़ना चाहिए।
या
अर्चना कक्षा आठवीं में पढ़ती है।
खेलना (सकर्मक) – बच्चे क्रिकेट खेलते हैं।
खेलना (अकर्मक) – बच्चे दिन भर खेलते हैं
खुजलाना (सकर्मक) – वह अपना सिर खुजलाता है।
खुजलाना (अकर्मक) – उसका सिर खुजलाता है।
घबराना (सकर्मक) – विपदा मुझे घबराती है।
घबराना (अकर्मक) – जी घबराता है।
सकर्मक और अकर्मक क्रियाओं की पहचान – कर्ता और क्रिया पदों के बीच ‘क्या’, ‘किसे’, या ‘किसको’ लगाकर प्रश्न करने पर जो उत्तर मिलता है, उसे कर्म कहते हैं और ऐसी क्रियाएँ सकर्मक कहलाती हैं तथा उत्तर न मिले तो क्रियाएँ अकर्मक होंगी।
पहचान – जैसे – (1) वह लजा रही है।
वह ‘क्या’ / ‘किसे’ लजा रही है? उत्तर अप्राप्त है – अकर्मक क्रिया।
(2) वह तुम्हें लजा रही है।
वह ‘क्या’ / ‘किसे’ लजा रही है? उत्तर ‘तुम्हें’ मिला – सकर्मक क्रिया।
अकर्मक से सकर्मक और प्रेरणार्थक क्रिया बनाना –
(प्रेरणार्थक क्रिया – जिन क्रियाओं का कर्ता स्वयं क्रिया न करके किसी दूसरे को प्रेरित करके कार्य करवाए, उन्हें प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं। जैसे – वह धोबी से कपड़े धुलवाता है। यहाँ (तिरछा छपा पद )क्रिया प्ररेणार्थक क्रिया है।)
अकर्मक प्रथम प्रेरणार्थक ‘आना’ वाला रूप (एककर्मक) द्वितीय प्रेरणार्थक ‘वाना’ वाला रूप (द्विकर्मक)
डूबना डुबाना डुबवाना
बिकना बेचना बिकवाना
लेटना लिटाना लिटवाना
जाना भेजना भिजवाना
बैठना बिठाना बिठवाना
लड़ना लड़ाना लड़वाना

क्रिया के अन्य भेद – 1. संयुक्त क्रिया 2. मुख्य क्रिया 3. सहायक क्रिया 4. रंजक क्रिया।
संयुक्त क्रिया – वाक्य में जहाँ दो या दो से अधिक क्रियाओं का एक साथ प्रयोग हो, तो वह क्रिया संयुक्त क्रिया कहलाती है।
जैसे – 1. घनश्याम रो चुका। 2. किशोर रोने लगा। 3. वह घर पहुँच गया
इन वाक्यों में (तिरछे छपे पद )पद संयुक्त क्रियाएँ हैं। ये क्रियाएँ दो या से अधिक धातुओं के मेल से बनती हैं।
संयुक्त क्रिया के मुख्यत: चार अंग अंग होते हैं

संयुक्त क्रिया = मुख्य क्रिया+सहायक क्रिया/संयोजी क्रिया/रंजक क्रिया
1. मुख्य क्रिया – कर्ता या कर्म के मुख्य क्रियाकलाप को व्यक्त करती है। दूसरे शब्दों में: जहाँ क्रिया एक पद में प्रकट होती है, वहाँ वही मुख्य क्रिया होती है। जैसे –
मैंने उसे पत्र लिखा – यहाँ ‘लिखा’ मुख्य क्रिया है, जो कर्ता ‘मैंने’ के मुख्य क्रियाकलाप (व्यापार) को व्यक्त करती है। जिन वाक्यों में संयुक्त क्रिया होती है, वहाँ मुख्य क्रिया की पहचान इस प्रकार करेंगे –
1. कर्ता या कर्म के मुख्य व्यापार को देखकर
2. क्रिया-पद के अर्थ को देखकर
3. ‘हुआ क्या है?’ लगाकर प्रश्न किया जा सकता है।
4. यह क्रिया पदों में प्राय: पहले आती है और सहायक, संयोजी या रंजक बाद में आती है।
जैसे – तुम इसे ले जाओ।
यहाँ ‘तुम’ कर्ता का मुख्य व्यापार है – ले जाओ (‘लेना’ तथा ‘जाना’ दोनों)
क्या हुआ है? – ‘लेना’ तथा ‘जाना’।
अत: यहाँ ‘ले जाओ’ दोनों मिलकर मुख्य क्रिया का कार्य संपन्न कर रही हैं। यहाँ मुख्य क्रिया है – ‘ले जाओ’।
2. सहायक क्रिया – काल का बोध कराने वाले क्रिया पद ‘सहायक क्रिया’ कहलाते हैं। जैसे – मैं प्राय: आ जाया करता हूँ । इस उदाहरण में ‘हूँ’ कालवाची है, अत: यहाँ (तिरछे छपे पद )सहायक क्रिया है।

5. क्रिया विशेषण अव्यय का पद परिचय
क्रिया विशेषण अव्यय का पद परिचय – भेद, क्रिया का उल्लेख किया जाता है ।
निम्नलिखित वाक्यों के रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिए –
हम कल जाएँगे।
आप वहाँ बैठिए
इन वाक्यों में रेखांकित पद क्रिया से पहले लगकर उसकी विशेषता बता रहे हैं। ये पद क्रिया-विशेषण हैं।
परिभाषा – क्रिया की विशेषता बताने वाले पद को क्रिया-विशेषण कहते हैं। ये क्रिया होने की रीति (विधि), मात्रा, क्रिया के काल और स्थान का बोध कराते हैं। इस आधार पर इनके चार भेद हैं –
प्रकार पहचान
1. रीतिवाचक क्रिया-विशेषण क्रिया कैसे हुई-? का बोध कराता है।
2. परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण क्रिया कितनी हुई? का बोध कराता है।
3. कालवाचक क्रिया-विशेषण क्रिया कब हुई? का बोध कराता है।
4. स्थानवाचक क्रिया-विशेषण क्रिया कहाँ हुई? का बोध कराता है।
उदाहरण –
(1)रीतिवाचक क्रिया-विशेषण –
1. रेलगाड़ी धीरे-धीरे चल रही थी।
2. हम शांतिपूर्वक सुन रहे हैं।
3. वह चुपके-चुपके खा रहा है।
यहाँ (तिरछे छपे पद )पद क्रिया की रीति का बोध कराते हैं। अत: ये रीतिवाचक क्रिया-विशेषण हैं।
रीतिवाचक क्रिया-विशेषण के रूप में प्रयुक्त होने वाले शब्द –
1. विधि बोधक – ध्यानपूर्वक, सहसा, हाथोंहाथ, सुखपूर्वक, परिश्रमपूर्वक, धीर-धीरे, शीघ्र।
2. निश्चयबोधक – अवश्य, नि:संदेह, ज़रूर, वस्तुत:, बेशक, सचमुच, हाँ।
3. अनिश्चय बोधक – अकसर, शायद, प्राय: बहुधा, संभवत:, कदाचित्।
4. हेतु (कारण) बोधक – क्यों, क्योंकि अत: अतएव, इसलिए, किसलिए।
5. निषेधवाचक – न, नहीं, मत, कभी नहीं।
6. प्रश्नवाचक – क्यों, कैसे।
7. स्वीकृतिबोधक – जी, हाँ, सच, ठीक।
8. अवधारणाबोधक – ही, भी, तो, भर, मात्र, तक। (इन्हें निपात भी कहा जाता है।)
9. आकस्मिकता बोधक – अकस्मात्, अचानक, एकाएक, सहसा।
10. आवृत्तिबोधक – चुपचाप, सरासर, खुल्लमखुल्ला, धड़ाधड़, फटाफट।

(2) परिमाणवाचक क्रिया विशेषण –
1. वह बहुत रोया था।
2. रमेश कुछ मुस्कराया।
3. मैं ज़रा/थोड़ा चला ही था कि बस आ गई।
उक्त वाक्यों के (तिरछे छपे पद )अंश क्रिया की मात्रा या परिमाण को बोध कराते हैं, अत: ये परिमाणवाचक क्रियाविशेषण कहलाएँगे।
अन्य प्रचलित परिणामवाचक क्रिया विशेषण – जितना, उतना, कम, अधिक, सर्वथा, अति, अत्यंत, कितना, तनिक, बस, इतना, पर्याप्त, खूब, निपट, थोड़ा-सा, बिल्कुल आदि।

(3) कालवाचक क्रिया-विशेषण –
1. अब से ऐसी बात नहीं होगी।
2. ऐसी बात सदा से होती रही है।
3. वह कब आया, मुझे पता नहीं।
उपर्युक्त वाक्यों में (तिरछे छपे )पद क्रिया के समय का बोध कराते हैं।
प्रचलित कालवाचक क्रिया विशेषण –
(क) कालबिंदुवाचक – आज, कल, कब, जब, तब, कभी, अभी, जभी, सायं, सुबह, परसों, पश्चात् आदि।
(ख) अवधिवाचक – आजकल, सदा, लगातार, निरंतर, नित्य, दिनभर, सदैव आदि।
(ग) बारंबारतावाचक – प्रतिदिन, बहुधा, रोज, हर बार, बहुधा, प्रतिवर्ष आदि।

4. स्थानवाचक क्रिया विशेषण –
1. हरीश ऊपर बैठा है।
2. तुम इधर आओ।
इन वाक्यों में (तिरछे छपे )पद क्रिया की जगह का बोध कराते हैं, अत: ये स्थानवाचक क्रिया विशेषण हैं।
प्रचलित स्थानवाचक क्रिया-विशेषण –
(क) स्थितिबोधक – आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, दूर, पास, आर-पार, भीतर, बाहर, यहाँ, वहाँ, सर्वत्र आदि।
(ख) दिशावाचक – इधर, उधर, दाहिने, बाएँ, की ओर, की तरफ, के दोनों / चारों ओर आदि।
(ग) बारंबारतावाचक – प्रतिदिन, बहुधा, रोज, हर बार, बहुधा, प्रतिवर्ष आदि।

अन्य अव्ययों का पद परिचय-
समुच्चयबोधक, संबंधबोधक, विस्मयबोधक अव्यय- अव्यय का भेद, संबंध, निर्देश आदि का उल्लेख किया जाता है ।
समुच्चय बोधक अव्यय – इसके दो भेद होते हैं- समानाधिकरण, व्यधिकरण। यह जिन शब्दों पदों वाक्यों को मिला रहा है, उनका उल्लेख करना।
संबंध बोधक- जिन संज्ञा या सर्वनामों में संबंध बताया जा रहा है, उसका उल्लेख करना।
विस्मयादिबोधक- जो भाव प्रकट हो रहा है, उसका उल्लेख करना।

पद-परिचय के उदाहरण-
उदाहरणस्वरूप कुछ पदों का परिचय दिया जा रहा है।
(क) मैं कल बीमार था, इसलिए विद्यालय नहीं आया।
1. मैं- सर्वनाम, पुरूषवाचक सर्वनाम, उत्तम पुरुष, पुल्लिंग, एकवचन, कर्ता कारक,
‘था’ क्रिया का कर्ता है- ‘मैं’।
2. विद्यालय- संज्ञा, जातिवाचक संज्ञा, पुल्लिंग, एकवचन, कर्मकारक, ‘आया’क्रिया का कर्ता है- ‘मैं’

(ख) यह घड़ी मेरे बड़े भाई ने दी है।
1. यह- विशेषण, सार्वनामिक विशेषण, स्त्रीलिंग, एकवचन, ‘घड़ी’ विशेष्य।
2. बड़े- विशेषण, गुणवाचक विशेषण, पुल्लिंग, एकवचन, ‘भाई’ विशेष्य का विशेषण।

(ग) नितिन दसवीं कक्षा में पढ़ता है।
कक्षा- संज्ञा, जातिवाचक संज्ञा, स्त्रीलिंग, एकवचन, अधिकरण कारक।
(घ) बच्चों ने अपना काम कर लिया था।
1. बच्चों ने- संज्ञा, जातिवाचक संज्ञा, पुल्लिंग, बहुवचन, कर्ता कारक,
‘कर लिया था’- क्रिया का कर्ता है- ‘बच्चों ने’।
2. कर लिया था- क्रिया, सकर्मक क्रिया/संयुक्त क्रिया, पुल्लिंग, बहुवचन, भूतकाल, कर्तृवाच्य, कर्तृरि प्रयोग।
(ङ) शीत ऋतु में हिमालय का क्षेत्र बर्फ़ से ढँक जाता है और वहाँ पर जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है ।
1. वहाँ- स्थानवाचक क्रिया विशेषण
2. अस्त-व्यस्त – रीतिवाचक क्रिया विशेषण, ‘अस्त-व्यस्त’ क्रिया की विशेषता बताता है।

अभ्यास प्रश्न
(क) निम्नलिखित तिरछे छपे पदों का पद-परिचय लिखिए –
1- मीरा घर में रहती है।
2- यह किताब मेरी है।
3- मैं धीरे-धीरे चलता हूँ।
4- मैं उसे आगरा में मिलूँगा।
5- वह कक्षा में बैठा रहता है।
6- मनोहर दसवीं कक्षा में पढ़ता है।
(ख) तिरछे छपे पदों का व्याकरणिक परिचय दीजिए-
1) अमृता ने आम खाया।
2) चिडिय़ा उड़ रही है।
3) अब आप घर जा सकते हो।
4) मुझे चाँद दिखाई दिया।
5) मोहन पुस्तक पढ़ रहा है
6) वह रात भर जागता रहा।
7) बच्चे मैदान में दौड़ रहे हैं।
8) वह हँस पड़ा।
9) हमारे शिक्षक हमें बड़ी मेहनत से पढ़ाते हैं।
10) आप चाय लेंगे या कॉफी?
11) मोहन बहुत ज़ोर-ज़ोर से हँसता है।
12) अभिनव ने हेमलता को पुस्तक खरीदकर दी।
13) वह रोज़ मीठे-मीठे गीत सुनाता है।

Published by LP CHAUDHARI

• व्यवसाय- जवाहर नवोदय विद्यालय पदमी (मंडला) में प्रशिक्षित स्नातक हिंदी अध्यापक(1997-2000) तथा वर्तमान में केंद्रीय विद्यालय संगठन में स्नातकोत्तर हिंदी अध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य। * शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार से संबंधित संभाग स्तरीय कई कार्यशालाओं और बारह से अधिक राष्ट्र स्तरीय विभिन्न शिक्षक - प्रशिक्षण पाठ्यचर्याओं में संसाधक (स्रोत- व्यक्ति) के रूप कार्य। * राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु आयोजित गोष्ठियों और कार्यशालाओं में व्याख्यान । • साक्षरता और जन-जागृति अभियान- ‘अक्षर सैनिक’ के रूप में प्रौढों को साक्षर करने संबंधी कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता । नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्त रखने हेतु 'राष्ट्रीय नदी संरक्षण - जन-जागृति कार्यक्रम' में संयोजक के रूप रचनात्मक भागीदारी हेतु नगरपालिका परिषद होशंगाबाद द्वारा प्रशस्ति-पत्र। • साहित्य-सर्जना – विभिन्न पत्रिकाओं जैसे- ‘प्रबोधिनी’, ‘प्रतिका’ आदि में रचनाओं का प्रकाशन । • सम्पादन – ‘प्रतिबिम्ब’, ‘प्रत्यूषा’ का सम्पादन । • सम्मान – * केंद्रीय विद्यालय संगठन –‘राष्ट्रीय प्रोत्साहन पुरस्कार’ -2015 * केंद्रीय विद्यालय संगठन –‘संभागीय प्रोत्साहन पुरस्कार’ -2014 * राष्ट्रीय स्तर पर – ‘चाणक्य सम्मान’ - 2014 (विपिन जोशी स्मारक समिति, इटारसी द्वारा) * वर्ष 2012 और 2013 में लगातार दो बार प्रतिभूति कागज कारखाना होशंगाबाद द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में ‘आदर्श कर्मचारी’ का सम्मान। * नर्मदापुर युवा मंडल द्वारा ‘प्रेरक सम्मान’ ।

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started